विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू जनजातीय समुदाय की भाषाई विरासत
भारत के विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू समुदायों की लुप्त होती भाषाओं का संरक्षण एवं प्रलेखन
भारत के विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू समुदायों की भाषाएँ सदियों से मौखिक परंपरा के माध्यम से संरक्षित रही हैं। इन भाषाओं में सांस्कृतिक ज्ञान, इतिहास और पहचान समाहित है। हमारा प्रयास है कि इन लुप्तप्राय भाषाओं को दस्तावेजीकरण और प्रौद्योगिकी के माध्यम से संरक्षित किया जाए।
प्रदेश की घुमन्तू, अर्द्धघुमन्तू और जनजातीय भाषाओं के विशिष्ट शब्दों का संचयन , प्रलेखीकरण और टॉकिंग डिक्शनरी के लिए ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग्स का निर्माण
घुमन्तू समुदाय की सबसे बड़ी पहचान उनकी भाषा है। वे स्थान त्यागते रहे। आवश्यकता पड़ी तो उन्होंने परिधान भी नूतन अपना लिए। किन्तु एक भाषा ही है जिसे उन्होंने नहीं त्यागा। उनके आपसी बोलचाल में आज भी वह भाषा प्रचलन में है, किन्तु आधुनिकीकरण के कारण उसमें तेजी से परिवर्तन हो रहा है। उस भाषा का न कोई लिखित दस्तावेज रहा है, न ही कहीं कोई अंकित व्याकरण अथवा शब्दकोश। यह एक शुभ संकेत है कि इन छोटे-छोटे और लगभग खोये-खोये से समुदायों की भाषाओं को लेकर भी एक सजगता का आरंभ हुआ है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने इस बात की पुष्टि की है।
एक समुदाय जो सदियों तक सतत घुमक्कड़ी में रहा हो, जिसने विविध मौसम, जलवायु, सांस्कृतिक और भाषाई वैविध्य के बीच अपनी जीविका वृत्ति को संभाला हो, उसकी भाषा भी निश्चित ही विविधवर्णी होनी चाहिए। उसमें निश्चय ही जीवन निर्वाह और स्वयं के अस्तित्व को बचाने की शब्दावली उत्पन्न हुई होगी। भाषा एक समुदाय का जीवंत अभिलेख है। भाषा के संसार में एक शब्द का होना एक संस्कृति के जीवित होने की भी सूचना है। ये शब्द अपने भीतर ज्ञान की धारा, अभिप्रायों और भंगिमाओं के अर्थ, सांकेतिकता, कूट शब्द विन्यास, सामाजिक अतीत और निरंतरता को संचित किये हुए हैं।
घुमन्तुओं की भाषाओं को राष्ट्र की सुरक्षा में रत प्रहरियों, लोकरंजन की जीवन वृत्ति को धारण करने वाले समुदायों, शिल्पकारों, काष्ठकारों, पूर्व आखेटकों, जड़ी-बूटियों-वनस्पति के पारंपरिक जानकारों ने समृद्ध किया है। घुमन्तू समुदायों का वाचिक कौशल देखते ही बनता है। वे अपने इस कौशल से ही देश देशान्तर एक करते रहे हैं। उनकी भाषा को भेदना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। शायद यही कारण है कि कोशकारों ने सब तरह के कोश की रचना तो की, किन्तु घुमन्तू समुदायों की भाषा के विशेष उदाहरण उपलब्ध नहीं हैं।
जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी विमुक्त और घुमन्तू समुदायों की संस्कृति, शिल्प, कला, देवलोक और भाषा परंपरा पर सतत कार्य कर रही है। विगत वर्षों में ही घुमन्तू विषयक कुछ उल्लेखनीय शिविर और संगोष्ठियों का आयोजन तथा प्रकाशन किया जा चुका है। इसी कड़ी में यह अनुभव किया गया कि विमुक्त-घुमन्तुओं की भाषाओं के शब्दों को आधुनिक प्रविधियों के साथ संचय किया जाए। यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य था, क्योंकि घुमन्तू समुदाय अपनी भाषा को प्रायः डिकोड नहीं होने देते।
देशभर में कतिपय विश्वविद्यालय और अकादमिक संस्थान इस दिशा में प्रयास करते रहे हैं, पर सफलता के उल्लेख नगण्य से ही हैं। इस चुनौतीपूर्ण कार्य की पृष्ठभूमि के रूप में अकादमी का विगत कार्य सहायक हुआ। अकादमी द्वारा विगत वर्षों में विमुक्त और घुमन्तू समुदायों की कला, शिल्प और वाचिक परंपरा पर कुछ अध्येताओं से सतत कार्य करवाया जा रहा है। इन अध्येताओं के जीवंत संपर्क, विविध सांस्कृतिक पक्षों पर समझ और संवेदनशीलता के विकास से समुदाय के सूचकों का सहयोग मिला और अध्येतागण इन समुदायों की भाषिक संपदा के अप्राप्य रहे शब्द भंडार तक पहुँच बनाने में सफल हुए।
इस भाषिक शब्द भंडार को भाषावैज्ञानिक ढंग से संधारित और प्रस्तुत करने के लिए विषय विशेषज्ञ समूह की सहायता ली गई। चयनित अध्येताओं को निरन्तर प्रशिक्षित करवाया गया। सूचकों के माध्यम से संदर्भित समुदाय के शब्दों का उच्चारणगत संचय डिजिटल रिकॉर्डिंग के द्वारा किया गया। साथ ही इस ध्वन्यंकन को इंटरनेशनल फोनेटिक अल्फाबेट (आईपीए) में अंकित कर भाषाविज्ञान में शब्दकोश निर्माण के लिए प्रयुक्त फ्लैक्स सॉफ्टवेयर में अपलोड किया गया है। अकादमी यह कार्य निरन्तरता में करने के लिए संकल्पित है।
मध्यप्रदेश की 51 विमुक्त और घुमन्तू जातियों में पारधी, कुचबंधिया, बेड़िया, बंजारा और गाडुलिया लोहार अपनी विशिष्ट पहचान के लिए जाने जाते हैं। इन पाँच समुदायों के इस शब्दकोश को त्रिभाषी स्वरूप में विगत वर्ष तथा इस वर्ष नट, कलंदर, कंजर, कालबेलिया और बांछड़ा घुमन्तू समुदाय की भाषा की टॉकिंग डिक्शनरी को विभागीय वेबसाइट पर उपलब्ध करवाया जा रहा है।
डॉ. धर्मेन्द्र पारे
निदेशक