बंजारा, जिन्हें लबाना-लम्बाड़ी के नाम से भी जाना जाता है, ऐतिहासिक रूप से
खानाबदोश व्यापारिक समुदाय है, जिसकी उत्पत्ति राजस्थान के मेवाड़ प्रांत से मानी जाती है।
ये एक अलग भाषा बोलते हैं, जिसे 'बंजारा' नाम से जाना जाता है।
मध्यप्रदेश में इसे 'गौर बोली', 'गोरमाटी' या
'बंजारी' तथा राजस्थान में 'लमानी' या
'लंबड़ी' भी कहा जाता है।
अपनी श्रमशीलता, नृत्य, गीत, परिधान, भाषा और 'टांडा' के कारण
आज भी इनकी विशिष्ट पहचान बनी हुई है।
अनेक लोककथाओं और गीतों में बंजारा समुदाय की उपस्थिति मिलती है।
भाषा-शास्त्रियों के अनुसार यह इंडो-यूरोपीय भाषा समूह से संबंधित है।
इस भाषा की कोई स्वतंत्र लिपि नहीं है।
सामान्यतः इसे देवनागरी, तेलुगु या
कन्नड़ जैसी स्थानीय लिपियों में लिखा जाता है।
हमारी टीम
दिशा निर्देशन: डॉ. कविता रस्तोगी, लखनऊ
भाषा विशेषज्ञ: डॉ. सुमेधा शुक्ला, लखनऊ
अध्येता:
- डॉ. पूजा सक्सेना, भोपाल
- नीलिमा गुर्जर, भोपाल
- शिवाजी राय, भोपाल
- डॉ. लक्ष्मीकांत चंदेला
सूचक
- पहाड़ी लाल सिंह माना, जबलपुर
- राजु सिंह कुचबंधिया, भोपाल
- रविकांत कुचबंधिया, सिवनी
- बसंती सिंह कुचबंधिया, भोपाल
- राधा देवी माना, जबलपुर