कलंदर एक घुमंतू समुदाय है, जो परंपरागत रूप से डेरा बनाकर जीवन यापन करता रहा है।
उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान उनके रीति-रिवाजों, परंपराओं तथा घुमंतू जीवनशैली में निहित है।
ऐतिहासिक रूप से भालू और बंदर के खेल दिखाना तथा जादू के करतब प्रस्तुत करना
उनके जीविकोपार्जन का प्रमुख साधन रहा है।
इन्हीं माध्यमों से वे विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करते हुए अपना जीवन निर्वाह करते थे।
वर्तमान समय में सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के कारण कलंदर समुदाय ने
अपनी आजीविका के साधनों में विविधता अपनाई है।
अब वे विभिन्न स्थानों पर घूमते हुए डेरा लगाकर
जड़ी-बूटियाँ, उपरत्नों की बिक्री तथा अन्य वैकल्पिक व्यवसायों से
भी अपनी आजीविका अर्जित कर रहे हैं।
कलंदर समुदाय की भाषा ‘पारसी’ कहलाती है।
प्रस्तुत कोश एक त्रिभाषीय शब्दकोश है,
जिसमें पारसी शब्दों के साथ उनके हिन्दी और अंग्रेज़ी अर्थ दिए गए हैं।
इसके साथ-साथ पारसी शब्दों का
IPA (International Phonetic Alphabet)
के माध्यम से भाषिक प्रलेखन भी किया गया है।
यह एक टॉकिंग डिक्शनरी है,
जिसमें कलंदर समुदाय के वक्ताओं द्वारा
पारसी शब्दों का प्रामाणिक उच्चारण उपलब्ध कराया गया है।
साथ ही, वाक्यों के माध्यम से शब्दों के व्यवहारिक प्रयोग को
भी समझा जा सकता है।
प्रस्तुत टॉकिंग डिक्शनरी में कुल
1884 शब्द,
466 वाक्य-प्रयोग तथा
129 छायाचित्र संकलित हैं।
इसमें कलंदर समाज की दैनिक जीवन-प्रणाली,
रीति-रिवाज, संस्कार, आजीविका तथा
न्याय-पंचायत से संबंधित शब्दावली को भी सम्मिलित किया गया है।
निर्देशन एवं सहयोग
दिशा-निर्देशन: डॉ. कविता रस्तोगी, लखनऊ
भाषा विशेषज्ञ: डॉ. सुमेधा शुक्ला, लखनऊ
अध्येता:
- डॉ. पूजा सक्सेना, भोपाल
- डॉ. अनीता सोनी, लखनऊ
- श्री हेमंत लोधी, भोपाल
सूचक
- श्री मोहम्मद रईस, भोपाल
- श्री मोहम्मद शाकिर, भोपाल
- श्री नूर मोहम्मद, टोंक
- श्री अजीमुद्दीन, भोपाल